सुंदर सुरम्य ठंडा है,
गाँव का ये तालाब,
बैठा है एक जोड़ा पंछी,
जोड़े हुए पांख,
एक लता लटकती पेड़ से
झूल रही है झूला,
आयी है ये वेला,
हो रहा सवेरा,
ची-ची करता चिड़िया दल,
उड़ने को चला है,
मेंढक फुदककर पत्तों से,
नहाने चला है।
ओस अब प्रौढ़ बन पत्तो से लुढ़की है,
मोती जैसी आभा उसकी,
किरणों से खिली है।
नव पादप भी लगा रहे है,
अटखेलियों का मेला,
आयी है ये वेला,
हो रहा सवेरा।
गोधन निकला सेर-सपाटे,
गाँव के कुछ ग्वालों संग,
सूरज भी अब आँख दिखाए,
बादलों के गालों संग
अब पानी में भी हलचल है,
जो सोया था सारी रात,
मचल गया है सोता भी,
करने को निर्झर बरसात
उठ रही है उमंग मेरी,
देख कर सब खेला,
आयी है ये वेला,
हो रहा सवेरा...