शहर उनका गली उनकी। हम तो राहगीर ठहरे।। आने जाने वाले परिंदे की तरह। हम तो मुसाफिर ठहरे।।
कुछ पल ठहर गए थे। हम शायद किसी के मकान में।। कुछ अदा किया कुछ बाकि रहा। हम तो किरायेदार ठहरे।।
कुछ वादे कुछ इरादे। कुछ यादें लिए जा रहे है।। हर जनम के साथी नहीं । हम अजनबी ठहरे।।
यकीन ना रखना की लौट आएंगे। हम कोई हवा का ज़ोका नहीं।। ये तूफ़ान है वीरान सा। हम सुर्ख रेगिस्तान ठहरे।।
ये प्यार ये मोहब्बत। ये जुमलों का इश्क़ नहीं।। हम दफ़न आशिको की जमात में। बेनाम कब्रिस्तान ठहरे।।
शहर उनका गली उनकी। हम तो राहगीर ठहरे।। आने जाने वाले परिंदे की तरह। हम तो मुसाफिर ठहरे।। ®(हैयान)


