
शहर उनका गली उनकी। हम तो राहगीर ठहरे।। आने जाने वाले परिंदे की तरह। हम तो मुसाफिर ठहरे।।
कुछ पल ठहर गए थे। हम शायद किसी के मकान में।। कुछ अदा किया कुछ बाकि रहा। हम तो किरायेदार ठहरे।।
कुछ वादे कुछ इरादे। कुछ यादें लिए जा रहे है।। हर जनम के साथी नहीं । हम अजनबी ठहरे।।
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