डर लगता है 


डर लगता है अब मुझे लोगों से

किसी के ज़्यादा क़रीब आने से

किसी से नज़दीकियाँ बढ़ाने से

डर लगता है झूठी उम्मीदों से

खोखली दलीलों से

डर लगता है सवालों से जवाबों से

झूठी कसमों से झूठे वादों से

डर लगता है किसी से दिल लगाने से

किसी से रिश्ता टूट जाने से

इसीलिए नहीं मिलती किसी से

तुम सही हो पर ग़लत मैं भी नहीं

डर लगता है अब मुझे

किसी के क़रीब आने से

टूटकर बिखर जाने से 

इसीलिये दूर रहती हूँ बस

वजह और कुछ भी नहीं…

कुछ भी नहीं …!