चक्रव्यूह
कुछ बातें अब तक मेरी समझ से परे है
मानो जैसे अनसुलझीं अनेक पहेलियाँ ...
जितना सुलझाने की कोशिश की,
उतनी ही गहरी उलझती गयीं ...
जब लगता है समझने लगी हूँ सब कुछ,
तब पल भर में टूट जाता है मेरा ये भ्रम ...
नित दिन मन में हज़ारों ख़याल उमड़ते हैं
और मस्तिष्क में कई सवाल मंडराते हैं ...
और इन सवालों के कोई जवाब नहीं
या है शायद, हाँ वक़्त के पास जवाब है ...
इन्हीं अनसुलझी पहेलियों में उम्र गुज़र रही है
सवालों-जवाबों के भ्रम में ज़िंदगी कट रही है ...


