दिल ने कुछ कहने को कहा

मैं दिल के अनुसार लिखता ही गया

वो समझ ही ना पाए तो क्या.....


नजर पड़ते ही हो जाते मेरे

चमन में जो बहार, लिखता ही गया

वो समझ ही ना पाए तो क्या.....


संताप भरे इस जीवन में वो 

खुशी के लम्हे चार, लिखता ही गया

वो समझ ही ना पाए तो क्या.....


बढ़ी हुई थी धड़कन फिर भी

दिल का समाचार लिखता ही गया

वो समझ ही ना पाए तो क्या.....


विरह में बहे थे जो मेरे, वो

व्यथा के अश्रुधार, लिखता ही गया

वो समझ ही ना पाए तो क्या.....


उस खत में ही,खत लिखने के

कारण कई हजार लिखता ही गया

वो समझ ही ना पाए तो क्या .....


सोचता हूं कमबख्त मै क्यों

इतने लफ्ज़ बेकार लिखता ही गया

वो समझ ही ना पाए तो क्या.....


हेमन्त सिंह