कैसी व्यथा में पड़े पार्थ तुम,
क्यों न चलाते बाण प्रिए ।
भूल गए क्यों खोले नुपुर,
उठाया गांडीव फिर किस लिए।
या भूले हो वर्ष द्वादश,
वन वन कैसे भटक जिए ।
कायरों सी विलाप न शोभित,
एक कुशल क्षत्रिय के लिए ।
मांगती है बस प्रमाण वीरता,
मुकुट नही है प्रतीक वीर का ।
स्वाभिमान को करो समर्पित,
रणभूमि में कण-कण रुधिर का।
जन्म मरण तो चक्र अनवरत,
आत्मा नहीं परिभाषा शरीर का ।
तुम करुणा को करके विस्मृत,
ठहरो न अब क्षण भर के लिए ।
केशव ,स्वजन का वध करके
पाप में भागीदारी क्यों ?
करना अपने कुल का विनाश,
है धर्म का हितकारी क्यों ?
अन्य मार्ग दिखला दो सखा,
मैं तो तेरे बलिहारी हूं......
पार्थ, मार्ग है यही श्रेष्ठ एक,
उलट न बहे प्रवाह नीर का ।
वैराग्य से ही तो जगत समन्वित,
वृष्टि भी तो है, त्याग मिहिर का ।
धर्म उत्थान उद्देश्य नारायण,
रूप धरा मानुष शरीर का ।
तुम तन के बंदी मात्र हो,
आत्मा के ना होते आत्मीय ।
कालचक्र तो सदा निरंतर,
बस थिर करो अपना हिय ।
धर्म के हित में गति भी उत्तम,
अधर्म में व्यर्थ तो मधुर अमिय ।
कैसी व्यथा में पड़े पार्थ तुम,
क्यों न चलाते बाण प्रिए ।
हेमन्त सिंह


