वो उलझी मेरी बातें, वो अनदेखा करती तेरी आंखें।

वो खामोश सी तू, वो खुद को मन में कोसता हुआ मै ।

वो अटपटा सा तेरा सवाल, वो बेतुका सा मेरा जवाब।

वो मन की कश्मकश, वो सुकून देती तेरी मासूमियत।

वो इधर उधर को बातें, तेरी बातों की बारीकियों में मैं

वो दूर दिखती तू, वो पास आने की कोशिश करता मै।

वो सुलझी सी तेरी कहानी,उसमे शामिल होता हुआ मैं।

वो जज्बातों में बहता मैं,मुझे वास्तविकता में लाती हुई तु।

वो नाराजगी दिखावा करती तु,वो गलती मानता हुआ मैं।

वो खुशकिस्मती के तेरे चार क्षण,वो भी बर्बाद करता मै।


इतना ही तो था ...हां शायद... इतना ही था

(हेमन्त)