धरा गगन जल अगन समीर
इन पांचों का बना शरीर
इन्ही में रहता इन्ही में जीता
इन्ही से इनका मधु रस पीता
है कितनी अद्भुत अदम्य मनोहर प्रकृति
हर पल मानव पर उपकार निरखती
हर कृति हर सुन्दर रचना इसकी हासिल
पर मानव क्या तू है इस काबिल
खेत बाग उजाड़ तूने कंक्रीट के जंगल खड़े किये
कहाँ से आये शुद्ध हवा कैसे हम जीवन जियें
सुख भोग की खातिर प्रकृति का आनंद त्यागकर
लगा उजाड़ने जीवन वृक्ष रख सांसों को अपनी ताक पर
दुर्व्यवहार से तेरे कितने पहाड़ खाई बन गये
तेरे दुस्साहस से नदियों में कितने नाले सन गये
मशीनी राक्षस रोज बढ़ रहे जहरीला अवसाद उगलते
विराट तृष्णा है इनकी ये मानव प्रकृति दोनों साथ निगलते
चेत जा रे तू समय के रहते ,
तू कौन सी सुध में हुआ मगन
आँखें खोल के देख जरा ,
है कैसा धुआँ धुआँ धरा गगन


