गर्मी के मौसम में कोहरा सा छा रहा है,

अंधेरे का साया और घना हुआ जा रहा है,


दवाओं की दुकानों पर लगी हैं लंबी कतारें,

हौंसले की दवा ना कोई खोज पा रहा है,


हालातों में बढ़ी अजब सी मायूसी और बेचैनी ,

उम्मीदों के बाजार में सांसों का सौदा किया जा रहा है,

 

वहां चुनावी सियासत में मशगूल रहे हुक्मरान,

यहाँ आदमी आंकड़ों में सिमटता जा रहा है।


बाजार सूने, अस्पताल भरे, दफ्तरों पर भी है ताले जड़े,

नमन उनको जो इस माहौल में बन कर मसीहा अडिग खड़े,


हमें है यकीन जल्द लौटेंगे फिर दिन मुस्कुराहटों वाले,

खुली हवा में जिएंगे मिलकर हम सब दुनियावाले।


- हेमंत