दो किनारो के बीच बहता शांत पानी,
जब लांघता है अपनी सीमाएं,
पसारता है अपने पांव,
फिर प्रलय बनकर,
धीरे-धीरे निगलता है
गांवो की सादगी और शांति,
शहरों की भव्यता और महत्वाकांक्षाएं,
और सभ्यताओं के अनगढ़ विकास को,
बुझा देता है चूल्हों की आग,
मिटा देता है रास्तों के नामोनिशान,
खेत खलिहान, मकान और दुकान,
उसके आगोश में नजर आते है...
बच्चों के पसंदीदा खिलौने,
मंदिर की मूर्तियां,
किसानों की फसलें,
जो बोयी थीं कर्जा उठाकर
जिसकी उपज बेचकर
करने थे न जाने कितने जरूरी काम,
भैंसे, गायें, नन्ही बछिया
और कुत्ते जो रहते थे गली में कभी
करते थे घरों की रखवाली
एक रोटी की आस में
बह जाता हैं सब कुछ...
एक हो जाता है आंखों से बहता पानी
कमर से उपर तक आये पानी से मिलकर
और नजर नहीं आता कुछ सिवाय पानी के
आसमान,सूरज, चांद, तारे
सब अपनी जगह हैं
पर छिन गई है किसी की जमीन
अब वहां है पानी का पहरा,
सुनती हैं तो केवल कुछ कराहती आवाजें,
और पानी पर तैरती भीगी प्रार्थनाएँ ।
- हेमंत