"गांठें"
गांठें कर देती हैं अलग,
किसी को — दो हिस्सों में।
जब ऐसा होता है,
तो दोनों के बीच
बन जाती है एक दूरी और
बीच में, चट्टान-सी खड़ी हो जाती है गांठें।
ये गांठें
समेट लेती है साथ
उन दोनों का एक हिस्सा,
जो अब उन गांठों का हो गया है
गांठें जोड़ती भी हैं
दो अलग-अलग हिस्सों को,
एक कर पर रख लेती हैं
सारी ताक़त अपने पास।
और फिर रहती हैं मौजूद —
वहीं, हमेशा के लिए।
गांठों की मौजूदगी
याद दिलाती रहती है
कि आपने
कैसे इस्तेमाल किया उन्हें —
जोड़ने में,
या अलग करने में?
गांठें जब लगती हैं,
घटता है विस्तार,
बढ़ती हैं दूरियाँ,
बिखरते हैं रिश्ते,
टूटता है स्वाभिमान —
और
तुम्हारा एक हिस्सा
अलग होकर
चला जाता है
उन गांठों के नाम सदा के लिए।
- हेमंत