गलती क्या थी मेरी ,मुकद्दर भी न समझ पाया,जो सजा दिया तूने सितम का, खुदा भी ना समझ पाया,कोशिश की ये आलम ने की,बात बन जाए दोबारा,पर आलम की कोशिशों से, बन गई कोई अफसाना,अफसानों की महफिल में, बैठा था एक दीवाना, दीवाने की आंखों में था, एक नगमों का पैमाना,( पैमाने भरी दीवाने की शबनम से मुलाकात हुई, तब महफ़िल में रौनक आई एक दीवाने की ग़ज़ल से) मगर ग़ालिब की नजरों से, मैं था तब तक अनजाना,,आनजनो कि महफिल में, मैं था तब तक परवाना,तबीयत की गज़लों में, था मेरा मुरझाना,तबलोगों के कर्तालो से, था मुझे अब जाना,दर्दे दिल को करनी थी, बयां कुछ बातें अफसानों की,( अफसाना में था दर्द इतना) की छलकी सबनम ऐसी मोती कुछ आखो जैसी,तब ना मैं समझ पाया ना तुम समझ पाए,तब ग़ालिब ने बोला बया हो गई ये दाशता तेरी,बस तेरी एक शबनम से ,बस तेरी एक शबनम से ,बस तेरी एक शबनम स