कभी कभी जो बिखरा है वो सिमटे हुए से, ज्यादा हसीन होता है....जैसे, तुम्हारी बिखरी ज़ुल्फें....इन्हें ऐसे ही रहने दो, समेटो मत, चादर पर बिखरी करवटों को, सिलवटों को...लपेटों मत...मेरे शब्द...तुम्हारे सामने बिखरे से पड़े रहते हैं..बिल्कुल मेरी तरह...और तुम, इन बिखरें शब्दों से एक पूर्ण वाक्य बना लेती हो...बिल्कुल तुम्हारी तरह....मैं, तुम्हारे घुटनों में बिखरा हुआ सा पड़ा रहना चाहता हूं....क्योंकि, ऐसा मैं किसी और के सामने नहीं हूं...तो है ना बिखरा हुआ, सिमटे हुए से ज्यादा दिलकश...-heer-