तेरे घर का दरवाजा 

मैंने खूब खटखटाया ,

पर तू तो 

हाथो में छुपाके मुंह 

रोति रही ;


कौन सी मजबूरी ने 

रुके रख्हा था तुजे ?

क्यों तमन्नाओ को 

गले में घोंट रख्हा ?


तेरे दिल से उठा 

बार बार 

एक ही आवाज़ ,


" प्रीतम ,


  क्यों खटखटाते हो ?

  दरवाजा खुल्ला हैं ,

  चले आवो "


पर होठो से तेरे 

निकल न पाए कोई लब्ज़ ,

धुल के गरम निश्वाश में 

सरे दो आँखों से अश्क !


“ This poem is written by ME – not by my AI generated Virtual Avatar at www.HemenParekh.ai “