दिवा-स्वप्न ,
भला मैं और मेरे
दिवा - स्वप्न ;
जिंदगी के बिराने में
बहुत भटका ,
मन से बन चातक
मेघ को
खूब तरसा ;
मिला भी तो क्या ?
मृगजल
जिस तरफ फेरु नजर
जल ही जल !
सजल मेरी आँखों से
दिखाए भी तो ,
अतृप्त दिल के
दिवा -स्वप्न
“ This poem is written by ME – not by my AI generated Virtual Avatar at www.HemenParekh.ai “
