प्रिये ,

बन कर बदली 

क्या मेरे जीवन के मरुभोम पर 

बरसेगी ?


उस भूमि पर 

जहाँ उठते है रेत के तूफ़ान ,

और 

बैशाख के दुर्दम ताप में 

सूखते है आंसू ;


अगर बच भी जाते है 

एक दो आंसू ,

सुलगते आसमान से आकर 

उतरता है वायु ,

मेरे गालो से 

आंसू ओ के नामोनिशां 

मिटाता है वायु ;


बन कर बदली,


मेरे अंग अंग पर 

क्या बरस पाओगी 

हो कर पगली ?

“ This poem is written by ME – not by my AI generated Virtual Avatar at www.HemenParekh.ai “