कहेके ,
" जा ,
तुज़े करती हूँ नफ़रत ",
कभी तो होता ठुकराया ;
मेरी बेवफाइयों के बदले
कभी तो किया होता
पराया !
मेरी जफ़ाओं का बदला
वफाओं से क्यों चुकाया ?
क्यों न कहा एक भी बार ,
" जा ,
तू न मेरा मित ,
ना मै तेरी प्रीत ? ",
गमोसे
कुछ राहत मिल जाती !
भुलाने तेरी याद
कुछ बात तो बन जाती !
दिल की गहरी तन्हाइयो में ,
जी लेने की
कुछ आश तो बन पाती !
काश !
तूने , कभी तो होता ठुकराया !