संध्या खिली है ,
मानो
ढलते सुरजने
जाते जाते
धरती को चूम लिया ;
दूर गगन से उठते
पंखीओ के चीत्कार
मेरे ह्रदय की गहराईओं में
गूंजते है ;
तन्हाइओ से घिरा हूँ मैं ,
मुझे शब्दों की क्या ज़रुरत ?
जिन्हे सुनना है कुछ
मेरे नीरव मौन को सून लो ;
ना ही मुझे
प्रकाश कीआश ,
जाने भी दो संध्या को ,
निबिड़ निशा के अंधेरो में ही
ले लूंगा ,
बचे जो है बाकी सांस
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