संध्या खिली है ,

मानो 

ढलते सुरजने 

जाते जाते 

धरती को चूम लिया ;


दूर गगन से उठते 

पंखीओ के चीत्कार 

मेरे ह्रदय की गहराईओं में 

गूंजते है ;


तन्हाइओ से घिरा हूँ मैं ,

मुझे शब्दों की क्या ज़रुरत ?


जिन्हे सुनना है कुछ 

मेरे नीरव मौन को सून लो ;


ना ही मुझे 

प्रकाश कीआश ,

जाने भी दो संध्या को ,

निबिड़ निशा के अंधेरो में ही 

ले लूंगा ,

बचे जो है बाकी सांस 



“ This poem is written by ME – not by my AI generated Virtual Avatar at www.HemenParekh.ai “