दूर ,
जहां धरती आकाश को मिलने 
तड़पती है ,
वहाँ 
सूरज छूपने चला  ;
मानो ,
आसमां का आँचल 
धरती को छू ने चला  !
और 
छू ते ही उठा 
धरती के दिल से ,
इक गीत अनूठा ,
पहुंचे नजर वहाँ तक 
हरी वादियों में 
गीत मेरा लहराया