Poetry 1 min read 623.3K reads

mukhtak


कई राते जागकर स्याह की हैतब कहीं जाकर आपने वाह की है

यूं ही नहीं आया है ये फन सुखन कामैने किसी से डूबकर मोहब्बत बेपनाह की है

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