अगणित तोहफ़े,कई संदेश भेज रहा था  देश-विदेश   अच्छा भी था , दिन था तेरा मिला अंध को  स्वर्ण सवेरा   खूब उड़ीं कल ,आसमान में तुम  उम्मीदों के विहान में   जश्न मनाया , ज्यों शादी हो 'एक दिवस' की आज़ादी हो   ख़ैर, चलो छोड़ो वो बात बीत गई सुख की वो रात   अब अपनी औकात पे आओ जाओ , बंधन में बंध जाओ   सीमा तेरी , चौका चूल्हा सास, ससुर, बच्चे और दूल्हा   काम तुम्हारा , घर में रहना बच्चे जनना , शोषण सहना   जन्म पा लिया , ये क्या कम है? तुम ज़िंदा हो , फिर भी गम है?   कितनी कोख में मर जाती हैं या कचरे में घर पाती हैं   तुमको जनम दिया , सोचो तुम कितना एहसान किया , सोचो तुम   क्यों स्कूल की रट पाले हो आँसू से घर भर डाले हो   पढ़ लिख कर भी क्या कर लोगी आसमान सर पर धर लोगी?   लिख लेती हो नाम , बहुत है घर में बैठो , काम बहुत है   शिक्षा से करता परहेज मैं धन उसको दूँ , या दहेज़ में   है विवाह भी करना तेरा तब होगा सुख मरना मेरा   क्या बोला ?? दफ्तर जाओगी? और कमाकर धन लाओगी?   और पुरुष ? हम घर पे बैठें?? खाली फ़ोकट मूछें ऐंठे?   अरे! मैंने यूँ ही बोल दिया था तुमको खाली झोल दिया था   घर की 'लक्ष्मी' बाहर जाए दुनिया कितने अर्थ लगाए   और हिफ़ाज़त कौन करेगा? ऊँचा नीचा कौन भरेगा?   छोड़ो कल की चढ़ी खुमारी सब समाज की है बीमारी   एक दिवस से क्या होना है? तुमको 'औरत' ही होना है   तुमको 'औरत' ही होना है...