स्वप्न की हक़ीक़त- थका हुआ जब, आया अंधेरे में, सोया तुरंत ही, जाके अकेले में, जैसे ही लेटा, आँख लग गई, सपनो में आइ , फिर से वही परी, जिसने मुझे ठुकराया, मोहब्बत में, ग़लतियों से बेरूख़ हुआ, जन्नत में, अब रातें अकेली, अकेला सवेरा, सपनो में मिलता, खोया शुकुन मेरा, उस रात जब सपने में, आइ महबूबा, अत्यंत खुबशूरत, मानो आठवाँ अजूबा, मीठी कहाँ कोयल, उसकी एक शब्द के आगे, आज जाने क्यों जूर गये, वो कच्चे टूटे धागे, उसने जन्मदिवस का, निमंत्रन दिया, दिल के बेदर्द घावों को, मरहम दिया, आज आशुओं को नहीं, चख लिया प्यासे प्रेम को, आज मुख की चीख़ ने, पा लिया मधुर मुश्कान को, तभी तैयार होने, सज धज के थोड़ा सवरने, निकल पड़ा है रांझा, अपनी हीर से मिलने, चलते चलते मैंने सोचा, ले लिया जाए एक तोहफ़ा, फिर मिले ना मिले मिलने मौक़ा, आज छूँ के निकला यादों का झोंका, थोड़ी देर मैं खड़ा हुआ, एक दुकान के नीचे, ले लिया एक झुमका, हमेसा पास वो रखे जिसे, दरवाज़े के पीछे आकर, पुकार उसका नाम, दरवाज़ा खोला उसने, मानो पहले से मिला पैग़ाम, देखते ही मुझे उसने, जोड़ से पकड़ा, लगे की वर्षों बाद, मिला कोई अपना, शिसक शिसक के रोई, क्यों जाने, कितना भी मनाऊँ, फिर भी ना माने, फिर धीरे से कानो में, आकर फूश फूशाई, की बड़ी वेदना में जिया, जब से हुई जुदाई, और उसने प्यार का, इज़हार कर दिया, आज इस सपने ने मुझे, वरदान दे दिया, खो गए हम दोनो, अब मदहोशि के फ़साने, आए ना सवेरा, कभी मुझे जगाने, लिपटे हुए है ऐसे, जैसे चंदन संग भुजंग, प्रेम के अंत में, उठती वासना की तरंग, आज तो सरहदों ने, रास्ता छोड़ा है, आज दो आत्माओं का, मेल हो रहा है, एक अनजाने से सुख को, प्राप्त मैंने किया, सो गया उसके साथ, बुझा के एक एक दिया, बोला मैंने उसको, की कभी छोड़ के ना जाना, जवाब में हैं आंशु, लबों को लबों से छुपाना, सो गया ना जाने कब, खुली आँखे तो सूरज, बग़ल में मेरे सो रही है, माशूमियत की मूरत, उठी वो अचानक ही, अब जाने का वक़्त आया, आज शाम फिर मिलने का, किया उस से वादा, उसने फिर से मुझे, अपनी बाहों में जकड़ा, आंशुओं ने फिर से, उसकी आँखो को पकड़ा, चुप करवा समझा बूझा कर, मैंने उसे मनाया, मैं हरपल तुम्हारे साथ हूँ, इस बात को समझाया, उठ के जाने लगा, कह के अलविदा मिलने के लिए, वो निहारती मुझे ऐसे, जैसे मैं उसका सहारा जीने के लिए, चलते चलते मैं, अपने घर के पास पहुँचा, चुभ गया एक किल, दायाँ पैर मेरा दुखता, ना जाने कही दूर से, एक आवज कानो में पहुँची, लड़खड़ाती बोली में, अपना ध्यान रखने मुझे कहती, बोलती की जीना मेरे लिए, मैं तुझमें ही जी लूँगी, दुखी ना होना ना रोना कभी, ये वादा तुमसे माँगूँगी, अलविदा कह कर, वो आवाज़ खो गई, पीछे मुझे दिखाई दी, धुँधली एक छवि, अचानक ही, पसीने से लतपत हो गया, सपने का दामन छोड़, मैं उठने लगा, मेरे पैर में दर्द की, अनुभूति मुझे हुई, बिजली की तेज़ी से दौरा, जूते की खोज की, देख के किल जूते में, डगमगाया विश्वास, असीम दर्द संग विलाप करने लगा, उस जूते के पास।।