-हर्षिता दीक्षित
आखिर वह जा कहाँ रही थी?
नादिया के कदम अपने लक्ष्य पर बड़ रहे थे कि उसे रोने की आवाज़ आती है? इस सुनसान जगह पर कौन रो रहा है? उसने हिम्मत करके बरगद के पीछे झांका तो दो निगाहों उसे देख रही थी, वह पीछे हट गई। यह एक बिल्ली थी, जिसके छोटे छोटे बच्चे रो रहे थे। उसे बिल्ली से डर लगता था लेकिन आज पहली बार उसने बिल्ली को देखकर राहत महसूस हुई की कोई इंसानी बच्चा न था।
नादिया की दो बेटियां थी, जिसकी वजह से घर में कोई उससे पसंद नहीं करता था। इस दुनिया में वह अपनी बेटियों के लिए जी रही थी।
रात के एक बज रहे थे। वह अपनी मंजिल पर पहुंच गई, शहर-ए-ख़ामोशा, कब्रिस्तान जा पहुंची। अचानक उसके पैरों को किसी ने पकड़ लिया था, वह लड़खड़ा कर गिर पड़ी, उसने पीछे देखा, "ओह! झाड़ी है।"
वह समझ नहीं पा रही थी कि उसे ढूंढना क्या था? धीमे-धीमे रोने की आवाज़ आने लगी और वह आवाज़ तेज होती गई। स्पष्ट था, यह किसी शिशु के ही रोने की आवाज़ थी, लेकिन इस कब्रिस्तान में? नादिया हर दिशा में देखने लगी। एकाएक जिस कब्र के पास वह खड़ी थी, उसके अंदर से खटखट हुई । पत्थर पर उसका नाम पढ़ना चाहा-
'तुझे क्या नाम दूं'
कब्र अपने आप खुद रही थी और ताबूत नज़र आने लगा था। वह खड़ी होती है और हिम्मत करके ताबूत में झांकती है। रोने की आवाज़ थम जाती है।जैसे ही वह ताबूत से दूर हटती है, रोने की आवाज़ वापिस तेज हो जाती है।यह क्या खेल है?
नादिया हिम्मत करके पूछती है, "कौन, कौन हो तुम?" उसे पता है की कोई बोल नहीं सकता। लेकिन जब जवाब आता है, "मैं? मैं तुम हूँ? तुम मैं हो?अम्मी, मेरा कोई अच्छा नाम रखोगी न?" और इसी सवाल के साथ अचानक से कब्रिस्तान की सभी कब्रों से खटखटाने की आवाज़ गूंजने लगती है ।
नादिया अपना पूरा जोर लगाकर कब्रिस्तान से बाहर भागती है । उसी क्षण, नादिया के कानों में आवाज़ गूंजती है, अलार्म की। डरावने सपने के कारण दहल उठने की बजाय वह ख़ुश होती है।
रहीम पूछता, "तुम इतनी सुबह कहाँ जा रही हो? आज हमें हॉस्पिटल चलना है। जा कहाँ रही हो? आज इसे गिरवाना है। तीसरी लड़की नही आएगी इस घर में।"
सास को धक्का मार वह घर से निकल जाती है। पीछे उसका पति और सास चिल्ला रहे है, " पागल हो गई हो क्या? हॉस्पिटल नहीं चलना क्या?"
नादिया अपनी तीनों बेटियों के साथ ऑटो में बैठ निकल जाती है। वह अपने पेट पर हाथ फेरती हुई कहती है, "नूर! नूर नाम रखूंगी तुम्हारा । खूबसूरत नाम है ना।"
आख़िर उसने बचा ही लिया अपनी बेटी को। हर लड़की को हक़ है ज़िंदा रहने का, चाहे वह कोख में ही क्यों न हो !
