जब छोटे थे,तब बातें समझते नहीं थे

सम्मान था,डाँट से डरते थे

नई उम्र में बात समझना नहीं चाहते

ऊँची आवाज में बातें सुनाने लगे

सम्मान,डाँट के डर को कैद में रख लिया

बूढ़ी आँखों की चमक, होठों की मुस्कराहट समझाना आज भी चाहती है

पर हमने तो समझदारी का पुरस्कार खुद को दे दिया

अब बड़े हो गए, याद आ रही पुरानी वही बातें सिखानी है, समझानी है नई पीढ़ी को

पर ये तो और समझदार निकली

समय ही नही है सुनने का

समझदारी को कैद करने की सजा तो मिलनी थी

यह बात आज समझ में आ ही गई।

- हर्षित कुशवाहा