कद को पहचान देने
खुद सिमट गई जमीन में
प्रेमिका सी स्वभाव में
पहचान ढूंढती मुझमें
प्यार निभाती रोशनी में
नाराज होती तम मे
साथ चाहती मुझसे
थकी नहीं कभी
न रूकी कभी
चलती रही मेरी इच्छानुसार
रुप लेती मेरी दिशानुसार
स्याह वर्ण में करती श्रंगार
देख नहीं पाया गुणों का आकार
भूमिका में शांत वार्ताकार
सिखाती रही हमेशा
विश्वास रखो समय में
विचार करो विषय में
तेज रखो नजर में
अथक परिश्रम करो कर्म में
प्रेरणा है वो,
सरल है वो,
गलती माफ करती
परछाई है वो
मुश्किलें हैं राह में
साथ रहना धूप में
मंजिल में पहुँचने दो
कहीं दूर चलेंगे चाँदनी में
- हर्षित कुशवाहा
