ये दिल के दरवाजे बंद रखा करो साहब
प्यार के दिये अक्सर आँधियों से ही बुझते हैं।
शौक तो था अपनी खुशी से मिला दूँ ज़माने को
बात क्या की उससे, ज़माने ने दर्द देख लिया।
कभी दिल उतरा था एहसास लिखने
अब दर्द में कोरे कागज़ ने शोर मचा रखा है।
जब सीने में समन्दर छुपा हो, तो मुस्कराना जरूरी है
नहीं तो सुनामी का तमाशा देखने वालों की कमी नहीं।
यादों को भी मौसम के नाम पर होना चाहिए,
जब भी रुकने को कहूँ , जाने का बहाना ढूँढ लेती हैं।
उसकी आँखें मुझसे प्यार से बातें करती हैं,
तस्वीर में ही सही, उसे सुनना आज भी अच्छा लगता है।
- हर्षित कुशवाहा


