स्वर्ग से सुंदर देश में हमने जन्म लिया,
महान इतिहास ने हमें गौरवान्वित किया,
धरती माँ प्यार से जीवन सुगम बनाती रहीं
और हमने वैश्विक चमक में अपनी ही संस्कृति को जख्म दिया।
भूल गये हम हमारी जिम्मेदारी,
आज माँ अपनी ही संतान से हारी,
प्रश्नों के तूफान बहुत उठ चुके हैं
अब जवाब की है बारी
लक्ष्य जब दीर्घ हो,
तब कदम अल्प नही हो सकते
संकल्प जब दृढ़ हो,
तब विकल्प नही हो सकते।
वर्षों की चोट से दर्द ज्यादा है,
जब हम एक हैं तो क्या बाधा है,
स्वतंत्रता संग्राम की क्रांति मशाल दिल में जला लो
विश्वगुरू बनने का भारत का भारत से ही वादा है।
कहानी हमें ही लिखनी है, किंतु कथानक में पात्र हैं कठिन
क्योंकि भारतीय होना आसान है किंतु भारतीय बने रहना कठिन।
धर्म के वर्चस्व में धर्म तो जाना ही नही,
असत्य जीतता रहा, हमने पहचाना ही नही,
विचारों के संघर्ष में शक्ति दास बनाती रही
और हमने अर्थ लोभ में संविधान को माना ही नही ।
बदलते समय में बदली इंसानियत की परिभाषा है,
गरीबी को जंजीरों से आज़ाद होने की अभिलाषा है,
मुखौटों के देखने मात्र से भूख तड़प तड़प कर दम तोड़ रही
और भ्रष्टाचार श्रंखला को बढ़ने की आशा है
आज वर्तमान युद्ध संग्राम में सारथी श्री कृष्ण तो हैं,
किंतु अर्जुन का मिलना कठिन है
क्योंकि भारतीय होना आसान है किंतु भारतीय बने रहना कठिन।
स्वर व्यंजन में बँटते समाज को ज्ञान नही,
बिना दोनों के विकास शब्द का निर्माण नही,
अब यदि विविधता के महत्व को एकता सूत्र में नही बाँधा
भविष्य की पीढ़ी का इतिहास को सम्मान नही।
देश के बिगड़े संगीत में शब्द ज्ञान तो हैं,
किंतु सुर लय ताल कठिनक्योंकि भारतीय होना आसान है, किंतु भारतीय बने रहना कठिन।
-हर्षित कुशवाहा


