अपनी आंखों में छोटे सपने लेकर चल पड़ा मजदूर है
अपने गांव से दूर किसी अंजान शहर में भटक रहा मजदूर है
हिम्मत इतनी की अंगारों पे चल रहा मजदूर है
लॉकडाउन में तड़प रहा मजदूर है
जो भी कमाता घर को भेज देता मजदुर है
खुद सुखी रोटी खाकर सो जाता मजदुर है
सच मे इज्जत का असली हक़दार मजदूर है
लॉकडाउन में तड़प रहा मजदूर है
अपने अपने घरों के लिए पैदल चल पड़ा मजदूर है
जब थकता तब निकालता अपने परिवार का तस्वीर है
दो रोटी में चार लोगों का पेट भर रहा मजदूर है
लॉकडाउन में तड़प रहा मजदूर है
सरकार भी मजदूरों के लिए क्या कुछ नही करती
कहती तो बहुत कुछ है पर कुछ खास नही करती
कहती है चावल दाल और बहुत कुछ दे दिया हमने
कहते है मजदूर बदले में बहुत कुछ ले भी लिया तुमने
~ हर्षित


