मैं प्रकृति हूं,मैं जल हूं,मैं वायु हूं, प्रतीत ऐसा होता कि जल्दी-जल्दी घटने वाली आयु हूं।
कष्टों की मार फिर है आई,प्रदूषण की घटा फिर है छाई,कुछ वक्त का का चैन मिला था जो मुझे,अब उन पर बंदी होने की बारी है आइ,मुझ प्रकृति को मां कहते हो आप लोग,
तो क्यों मां से इतनी विनती करवाते हो,बार-बार वही बात कह कर थक गई हूं मैं,कहो मेरे बच्चों मुझे इतना क्यों सताते हो। काम ज्यादा कठिन नहीं,अरे अपनी बुरी आदतों को तो बदलना है,अरे प्रयास कर के देखो,तुम्हें कौन सा जलते हुए कोयले पर चलाना,
चलो फिर वही बात एक बार फिर दोहराती हूं,मैं मां हूं मेरा संरक्षण करो,मैं तो तुम सब को पाल कर बचाती हूं,पाल कर बचाती हूं।।
-हर्ष लखोटिया
