कौन हूं मैं
कणों से बना एक कण हूं मैं,
बीतते पलों का एक क्षण हूं मैं,
नदियों की धारा की एक धार हूं मैं,
बरसते पानी की एक फुहार हूं मैं,
अग्नि की हल्की सी अगन हूं मैं,
चमकदार होकर भी क्यों अंधेरे में मग्न हो मैं,
तैर कर भी डूब जाता हूं मैं,
समझ कर भी नासमझी खुब दिखाता हूं मैं,
बखूबी जानता हूं उजीयरे को फिर भी, अंधियारे की ओर जाता हूं मैं, सिलसिला चल रहा है खुद को जानने का,
मैं कौन हूं ये जानना चाहता हूं मैं।
-हर्ष लखोटिया


