है ज़िन्दगी बाक़ी अभी, चलिए मानते है कि ख़ैरियत है



सासें भी चल रही हैं सहारे मशीनों के, यही तबियत है









रजिश है मुख्तसर सी ग़म भी जैसे अनसुनी फरियाद हैं


व
ली भी नही लगता ख़ुश,उसकी अपनी ही कैफियत है





ख़ोजते रहे ज़ौक-ए-इश़्क को कि इक वो ही शमशाद है

अनजान थे कि हमें तो समझते बस यहां मनहूसियत है






यूं ही चल दिए, सोचकर कि ईद पर हर बाज़ार आबाद है 

होकर बेआबरु जाना, मुफ़्त में मिलती तो सब नसिहत है






इल्म न था पाबंदियों का उड़ रहे थे हम भी आज़ाद है

पोशीदा ज़ंजीरों ने गिराया ऐ आज़ादी तू भी फजिहत है





तूफ़ान में लौ सी सुलग रही अभी भी आबाद इंसानियत है

है ज़िन्दगी बाक़ी अभी, चलिए मान लेते है सब ख़ैरियत है