शांत रहता हुँ , परिस्थितियो की प्रताडना में भी शांत रहता हुँ,जब दिखे पथ की दिशा या ना भी शांत रहता हुँ, अदृष्ट के अंधकार में डूबकर भी कि एक विचार करके ये भी छुप जाने से मेघों में रवि अस्त नहीं  करे परिश्रम नित, उसका परिश्रम परास्त नहीं बचना चाहा जिन टकरावों से,नित मानव टकराया ही ऊंच नीच जात पात देख, विधि कभी बदलती नही
शांत रहता हुँ, जो चाहा वो पाया या नहीं शांत रहता हुँ , जो था पास में बहा तो बहा सही शांत रहता हुँ, रूठा हो कोई मेरी सीख पे भले कभी कि एक विचार करके ये भी बांध बांध देने से, नदियाँ बहना छोड नही देती एकत्र पर्वत सा सब करने से , जीवन बीत जाता नहीं देख परिस्थितिया विकल, मन में न हो प्रश्नों का कौतुहल समय समक्ष आयेगा ,समय है हर प्रश्न का हल शांत रहता हुँ, शांत रहता हुँ..