मेरी लेखनी, मेरी कविता
ये बसंत, ये बसंत
(कविता) बसंत महिमा 

ये बसंत ,ये बसंत,
 जीवन की है, नवीनता चहुुँओर दिगदिगंत ।
ये बसंत, ये बसंत ।।

सूरज की रोशनी ,
फैली है फिजाँ में,
 विहगों की कलकलाहट सतरंगी जहांँ में।
 माँँ भारती का आंँचल, फैला हुआ अनंत।
 ये बसंत, ये बसंत।।
  
जिस और देखता हूंँ, नवचार  नजर आए,
 बागों के सुप्त  फूल भी अब कोपलें खिलाए ।

आशीष सरस्वती का
हम सबको खिलखिलाए, करता कल्याण
 जीवन पर्यंत।
 ये बसंत, ये बसंत।।

 आंँगन में ,इस जहां के फूल खिल रहे हैं,
 सुषुप्त सी फिजाँ के आंँचल मचल रहे हैं ।

यह जिंदगी का आलम बदला ही जा रहा है। स्वागत करो दोस्तो
 बसंत आ रहा है।

 हरिशंकर सिंह सारांश