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चेहरे पै चेहरा


मेरी लेखनी मेरी कविताचेहरे पै चेहरा

हमनेचेहरे पै चेहरा लगाकर देखाजो लोग बिछड़ गए थे हमसेउनको भी नजदीक आते देखा ।।

— हरि शंकर सिंह सारांश
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