आखिर तुम भूल ही गई ना अपना वादा,
जो किया था तुमने कुछ रोज पहले कि,
इस दीवाली पक्का मिलने आउंगी तुमसे,
तुम्हारी पसंद का कुरता भी लाऊंगी,
तुम्हारी पसंद की काजू कतली मिठाई भी लाऊंगी,
और कहाँ था तुमने कि इस दीवाली साथ में दिया जलाएंगे,
लेकिन अफ़सोस..,
इस दीवाली भी तुम ना आई
ना ही मेरा कुरता आया..,
और ना ही कोई मिठाई आई
तुम्हारे इंतज़ार में दीवाली की खुशयों के बीच..,
फिर मेरी आँखों में एक उदासी छायी,
बार बार अंदर से एक ही सवाल मन में आया,
कि आखिर इस बार तुम क्यूँ नहीं आई..!!
#स्वरचित:- हरीश विद्रोही
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