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तब भी तुम मौन रहो,यह कतई ठीक नहीं।

इस बहकती हुई दुनिया में

झूठ फरेब के बोलबाला में

हम ही सही को मनबाने लगे

तब भी तुम मौन रहो,यह कतई ठीक नहीं।


ना जाने किसकी नज़र लगी हमें

विविधता में एकता वाली माधुर्य में

अपनी प्रोपेगंडा वाली आबोहवा की ताक हो

तब भी तुम मौन रहो, यह कतई ठीक नहीं।


सत्य और अहिंसा की इस मिट्टी में

अथक शास्त्रार्थ वाली अपनी पहचान में

हर बात पर आग लगाई जाए

तब भी तुम मौन रहो, यह कतई ठीक नहीं।


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