इस बहकती हुई दुनिया में
झूठ फरेब के बोलबाला में
हम ही सही को मनबाने लगे
तब भी तुम मौन रहो,यह कतई ठीक नहीं।
ना जाने किसकी नज़र लगी हमें
विविधता में एकता वाली माधुर्य में
अपनी प्रोपेगंडा वाली आबोहवा की ताक हो
तब भी तुम मौन रहो, यह कतई ठीक नहीं।
सत्य और अहिंसा की इस मिट्टी में
अथक शास्त्रार्थ वाली अपनी पहचान में
हर बात पर आग लगाई जाए
तब भी तुम मौन रहो, यह कतई ठीक नहीं।
सर्व धर्म समभाव वाली आधार में
मानवता के पर्यायवाची वाली साख में
जब हर रोज बट्टा लगने लगे
तब भी तुम मौन रहो, यह कतई ठीक नहीं।
पढ़ें लिखे के निज स्वार्थ वाली तर्क में
कान नही कौआ की जल्दबाजी में
हैं अपनी -अपनी आकाओं के गिरफ्त में
तब भी तुम मौन रहो ,यह कतई ठीक नहीं।
लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर में
क्षणिक शोर में दबते सच में
संविधान बचाने को संविधान ही जलाने लगे
तब भी तुम मौन रहो,यह कतई ठीक नहीं।
हरिओम शंकर
02/02/2020
दरभंगा, बिहार


