गलतफहमी के बिसात पर
तुमने अपना 'फैसला' सुनाया
पर मैं भी जब सच ना बोलूं
तुम ही कहो मैं दर्पण कैसे ?
यूं तो हर दफा कोशिशें की है मैंने
तुम्हें सच से रूबरू कराने की
पर जब ना क्रोनोलाजी समझो ,ना तार्किकता हो
भला मैं भी और क्या कर सकता हूं
मैं भी जब सच ना बोलूं
तुम ही कहो मैं दर्पण कैसे ?
यूं तो पहले ही दिन कहा था तुझको मैंनें
बहुत कुछ खोया है अपने उसूलों के कारण
इतना खोकर अब समझौता नहीं करूंगा
सही को सही और ग़लत को ग़लत कहुंगा।
मैं भी जब सच ना बोलूं
तुम ही कहो मैं दर्पण कैसे?
कई दफा तो तुमने भी देखा है मेरा फैसला
भीड़ से इतर खुद की ही कान पकड़ी है मैंने
ततक्षण परेशान होकर भी जीतता मैं ही था
तभी तो तुमने भी कहा था दर्पण मुझको।
मैं भी जब सच ना बोलूं
तुम ही कहो मैं दर्पण कैसे ?
तुम अक्सर कहा करती थी
भरोसा आधार है रिश्तों की
मैं तब भी तुमको कहता था
देखुंगा भरोसा तेरा, समय तो आने दो
मैं भी जब सच ना बोलूं
तुम ही कहो मैं दर्पण कैसे ?
सामना तो हो उस सच से ,जो तुम्हें पसंद नहीं
समझना तो दूर, तुमने तो मर्यादा ही तोड़ दी
लांघकर सीमा रेखा, गालियां की बौछार कर दी
बनकर शूल जा गरी है, हृदय में मेरे
मैं भी जब सच ना बोलूं
तुम ही कहो मैं दर्पण कैसे ?
तुमने तो आरोप भी वैसा लगाई
जिसे सुनने मात्र से
मेरी संवेदना ने
मुझको मुझसे ही दूर कर दिया
मैं भी जब सच ना बोलूं
तुम ही कहो मैं दर्पण कैसे ?
अब तो सुख चुकी है
आंख की आंसु भी
पर अपने उसूल पर चलूंगा आज भी
देर लगे भले पर एहसास तो होगा तुमको भी
मैं भी जब सच ना बोलूं
तुम ही कहो मैं दर्पण कैसे ?
हरिओम शंकर
दरभंगा


