ना जाने
कब समाप्त होगा
मेरा यह युद्ध।
लगता तो
ऐसा ही है
मानो मेरे जीवन में
चैन की पुड़िया ही नहीं।
अब तो कुछ भी नहीं जानता
अपने ही बारे में
पता नहीं कब तक
जकड़े रख सकूंगा खुद को
संस्कारों और सिद्धांतों की जद में।
संस्कार और सिद्धांत
इसकी भी तो हद है
भूखे तो रह सकता पर
आत्म सम्मान न बेचा जाएगा।
जारी है
द्वन्दात्मक युद्ध
जिसके चक्रव्यूह में
गिरफ्त हो चुका हूँ मैं।
संदर्भानुसार
हर बार दृष्टि बदलती है
निष्कर्षतः
संस्कार और सिद्धांत
दोनों ही विरोधाभासी।
संस्कारवान होकर
गलत को पीते रहना, या
सिद्धांतवादी होकर
भूखे मरते रहना
शायद दोनों ही गलत।
लड़ना तो चाहता हूँ
अपने सिद्धांतों, अपनों से
पर क्या करूँ
जब जीत में भी
हार नजर आता है।
अब कौन सी जीत, जीत
कौन सी हार, हार
नहीं पता
पर ऐसा लगता है
अंग्रेजों के खिलाफ
भगत सिंह बनना
शायद कहीं आसान था।
हरिओम शंकर


