जीवन का साध्य, बस इतना
करूं पलायन, जिस दिन क्षिति से।
कसक सहस्त्र हिय, गुल की वृष्टि
बनूं बानगी, शत्-शत् जीवन।।
क्षणिक लाभ-हानि और यश-अपयश से
ना हूं विचलित अपने पथ से।
श्रम तपस्या और दूर दृष्टि से
बनूं बानगी शत्-शत् जीवन।।
सच कहने की हिम्मत हो हर पल
देख सकूं दर्पण में हर दम ।
मानवता का बोध हो हर क्षण
बनूं बानगी शत्-शत् शत् जीवन।।
ना सीखूं केवल पोथी से
सिद्धांत पर भारी व्यवहार हो अपना।
निज-पर की मैं सीमा जानूं
बनूं बानगी शत् शत् शत जीवन।।
गरिमामयी अतीत को जानूं
परंपरा से जुड़ा रहूं।
आने वाले पीढ़ी को, कुछ मानक दे कर जाऊं
बनूं बानगी शत्-शत् जीवन।।
हरिओम शंकर
दरभंगा, बिहार।


