कोई भी धर्म हो
कोई भी देश हो
कोई भी समाज हो
हर एक त्योहार में
विषमताएं व्याप्त है।
अगड़ा - पिछड़ा हो
ऊंच - नींच हो
अमीर - गरीब हो
हर एक परिधी में
आपसी तुल्यता है।
विविधताओं से परिपूर्ण
भारतीय संस्कृति में
चहुंओर हर क्षेत्र में
हर एक मौसम में
त्योहारों की धूम है।
तथापि इन सबों के बीच
प्राकृतिक स्वच्छता और
समानता का ध्येय लिए
संभवतः छठ ही
एकमात्र पर्व है।
घर के आजु - बाजु
आसपास की सड़कें
पोखर तालाब नदियों
तक जाती पगडंडियां भी
सबकुछ साफ सुथरा है।
बांस के बने डाला हो
मिट्टी के बने ढ़किया हो
हरद ओल सुथनी हो
बतासा चिनी पाक लड्डु हो
सबकुछ सहज उपलब्ध है।
रोजगार के अवसर हों
पर्यावरण का संरक्षण हो
डुबते सूरज को अर्घ से
कृतघ्नता का भाव हो
हर क्रिया में एक संदेश है।
वाह्य आडंबर से दूर
निज की सीमा से परे
हर व्यवहार में समाज है
अतएव छठ महाव्रत है।
हरिओम शंकर
दरभंगा, बिहार।
छठ -२०२०।


