यूं तो वाकिफ था
तेरे रग - रग से मैं
पर जरा सा भरोसा
खुद पर भी था।
मेरे इतने करीब थे
मुझको तो पढ़ लेते
केवल कप नहीं फोड़ा है तुमने
तोड़ा है मेरा गुरुर।
कमबख्त "नीज" नहीं
मेरे शब्दकोश में
आहत हृदय स्पंदन तेज
'स्व' -'पर' की रेखा अर्थ-पूर्ण।
"तुम" से मेरा संबोधन
व्यथित मन और अश्रुप्रपात
कैसे बांटू जग में प्रणय
तुमने तौल दी मेरी औकात
तेरा मुझसे ऐसा व्यवहार
स्नेह का ऐसा प्रतिकार
महज मैं नहीं हूं भीत प्रिय
अनुराग स्वयं अधीर प्रिय।
हरिओम शंकर
27/01/2021


