लाॅकडाउन हटने की आशा में पूज्य हरिवंशराय बच्चन जी के आत्मस्वर

   ।। पुनः मधुशाला ।।


बंधन से मुक्ति को आतुर,

परिचित भाव ह्रदय वाला ।

मित्रों के मन का आवाहन,

पुनः चाहिये मधुशाला ।।


प्राणप्रिये तुम दूर रहे,

यह अनुभव था विस्मृति वाला ।

कण्ठ तरसता रहा निरन्तर,

पर हाथों को धो डाला ।।


तुम हो, तो मैं हूं, यह कैसा,

अस्तित्व बोध दर्शनवाला ।

एक सहज संतोष मुझे था,

पास है मेरी मधुशाला ।।


जीवन में तो द्वन्द बहुत हैं,

पर निर्द्वन्द यही हाला ।

नीरस,निर्जन मरुजीवन में,

मरुमंगल यह मधुशाला ।।


क्या अच्छा,क्या बुरा जगत में,

जिसने चाहा कह डाला ।

पाप-पुण्य की विवेचना से,

सदा अछूती मधुशाला ।।


जड चेतन के विकट समर में,

धधक रही विस्तृत ज्वाला ।

शांत,सहज विजयी भावों की,

पोषक है यह मधुशाला ।।


ऊंचे दिव्य विचार लिये,

जीवन को जिसने रच डाला ।

उसके मन की गहराई में,

व्यापक है यह मधुशाला ।।

   ****हरि किशोर***