ज़िन्दगी किस चिड़िया का नाम है??
वो जो कूदती -
फुदकती सपनों के दाने चुनती है..
यादों को चोंच में दबाकर इस तरह घोंसला बनाती है
जैसे उम्र भर को वहीं रह जायेगी...
जब जागेगी तो एक एक लम्हे को,
एक एक याद को भर आँख निहारेगी।
और सोती है तो उन्हें कम्बल बनाकर ओढ़ने पर महफूज़ महसूस करती है।
सुबह उठते ही गाती है।
चहकती है। थिरकती है।
मुझे उसका होना बहुत खूबसूरत लगता है।
दिल करता है कि वक्त थम जाए और मुझे मेरी
आहट भी महसूस न हो..
मैं बस उस चिड़िया को पानी के साथ खेलते देखना चाहता हूँ।
देखना चाहता हूँ कि कैसे उसके फड़फड़ाते पंखों से
ज़िन्दगी बूँद - बूँद छिटकती है...
और जी लेना चाहता हूँ
उस लम्हे को जब वो पाँखें खोल कर उड़ जाती है सारे बंधन,
सारे डर,
सारी एहतियाते पीछे छोड़ कर।
मैं लकड़ी बनकर उसकी चोंच की खुरच को महसूस करना चाहता हूँ...
और उस पेड़ की सबसे ऊपर वाली डाल पर झूलना चाहता हूँ।
मैं उसकी मीठी आवाज़ को मेरी आँख लगने तक सुनते रहना चाहता हूँ ।
मैंने देखा है कि अब मैं तूफानों से,
रात के अंधेरों से,
गीदड़ों की आवाजों से कम डरने लगा हूँ।
क्योंकि मुझे लगता है कि मैंने जान लिया है
कि ज़िन्दगी जीने के लिए ज़िन्दगी का जिया जाना बहुत ज़रूरी है..