बाहर के रावण को मारा, लेकिन अंदर है जिन्दा ।

क्यूँ, समझे नहीं क्या!

खुलेआम घूम रहा है,दरिंदा ।

बिना संस्कारों के कैसे मारोगे इसे?

क्या मन में बैठा रावण, कोई छोटा-मोटा है परिंदा ?

जो भारतीयता में थे विद्यमान,वो संस्कार सबमें लाने होंगे।

वरना कैसे रोकोगे,इसे?नए-नए अफ़साने होंगे।

घर-घर में है जा पहुँचा, ये हर जगह है जिन्दा।

क्या आपने इसे समझ रखा है, कोई छोटा-मोटा परिंदा?

हाथरस में ,दिल्ली में,

कहाँ-कहाँ बताऊँ,हर नुक्कड़,हर गल्ली में।

बेटियों को अब भी होना पड़ता है,शर्मिंदा।

हाँ,अभी भी वायरस सा फैला हुआ,दरिंदा।

उठो,हुँकार भरो,

लोगों मन-मस्तिष्क में बैठे रावण पर वार करो।

अब नहीं बचना चाहिए,जिन्दा।

चाहे जहाँ भी हो दरिंदा।