मुझे मौत चाहिए,

कहाँ मिलती है ?


कहीं मिलती ?


मिलवाओ ज़रा , दूं दान प्राण उसको अपने चरणों पर लाऊं ज़रा।


चप्पा - चप्पा छाना जीवन का 

अब मौत का शीश झुकाऊँ,

जैसे भूत की हो लंगोट भागती

ऐसे उससे भीड़ जाऊं 


कहीं मिले ! तो मिलवाओ 

दो - दो हाथ हो जाए ज़रा।


मुझे मौत चाहिए ,

कहाँ मिलती है ?


मिलवाओ ज़रा, दूं कान पकड़ के उसे घसीट चौखट पर अपनी लाऊं ज़रा।


दूं दिखा शक्ल को शीशे में 

खुद से परिचय करवाऊं,

हो पड़ी धरा पर भीख मांगती 

मैं धर्मराज हो जाऊं ।


कहीं मिले अगर ,

मिलवाओ ज़रा ।


मुझे मौत चाहिए ,........


             ~हैप्पी गिरी