शाम हो गयी है घर के बच्चे अभी भी अपने पापा के इंतिज़ार में हैं...


पापा आएँगे तो कुछ लाएँगे कब से भूखे हैं हम,

हर रोज़ की तरह आज भी खाने को तरसे हैं हम ।।

क्या पापा आज कुछ इंतिज़ाम कर पाएँगे ???

या रोज़ के जैसे हम आज भी भूखे सो जाएँगे ।।

चिड़ियों की चहचहाहट और सूरज डूबने को है,

अब लगता रूह, जिस्म का साथ छोड़ने को है ।।

एक तरफ़ भूख की तड़प हमें जीने नहीं देती,

और हमारे पापा की फ़िक़्र हमें मरने नहीं देती ।।

काश हमारी ग़रीबी की शाम भी क़रीब हो जाए,

कपड़े, मकाँ न मिलें पर रोटी तो नसीब हो जाए ।।

कि मोहब्बत से देख ने लगे हर इंसाँ, इंसाँ को,

तो हर इक शख़्स की भी क्या ख़ूब ईद हो जाए ।।

ख़ुदा कोई किसी से भी कभी दूर न होने पाए,

हाथ फ़ैलाने को बाप कोई मजबूर न होने पाए ।।


कैसे-कैसे तलाश करते होंगे एक वक़्त का खाना भी हाथ फैलाकर या सर झुकाकर...


~ #हनीफ़_शिकोहाबादी ✍️


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