मैं उस की बातों को
मोहब्बत का दरिया समझता रहा,
वो कहती रही अपनी-अपनी और
मैं था जो सुनता रहा ।।
मैं सोचा इश्क़ करती है चलो इज़हार करते हैं
कूद के दरिया को इस पार से उस पार करते हैं
बुन रहा था ख़्वाब अपने
मैं तो खुली आँखों तले
दिल को क्या ख़बर थी कि ऐसा होगा,
वो बोली अच्छा सुनो
वो हमें बेहद पसंद है
हमें उस से प्यार है हमारे लिए वो कैसा होगा
बस इतना सुना कि
रुक गईं साँसें,
बोली क्या सोच रहे हो,
उस ने फिर पूछा
अचानक होश में आए
और बोले किसी के
सपनों को पूरा करने का
रस्ता खोज़ रहे हैं
सपने उस के हुए पूरे मैं देख रहा
ज़िंदगी बर्फ़ सी जम रह रही थी
मैं तड़प रहा था लग रहा था जैसे
इस जिस्म से रूह निकल रही थी
ख़्वाब टूट रहे थे ज़िंदगी में
हम पीछे छूट रहे थे
एक एक पल भारी था,
गला बैठ रहा था
कुछ नहीं सूज रहा था
साँसे चल रहीं थीं
नब्ज़ मानो थम गई थी
वो सवाल नहीं था उस का
ऐसा लग रहा था कि
जैसे किसी ने रूह को
जिस्म से अलग करने की
बात कही हो हम से
हम तो बस सुन्न हो चुके थे
कोई भी जवाब न था
सवाल का उस के
बस ख़्याल आ रहा था
कि काश सब कुछ
कुछ समय पहले जैसा हो
ये समय ज़िंदगी से कट कर लिया जाए
जैसे फिल्मों में से
किसी सीन को काट दिया जाता है
ठीक उसी तरह
काश ऐसा हो पाता
मगर अफ़्सोस ज़िंदगी
को कुछ और ही मंजूर था
वो ठहर सी गयी थी
जिस तरह दूध का दही
बनाया जा रहा होता है
ठीक उसी तरह-ठीक उसी तरह...
~#हनीफ़_शिकोहाबादी✍️
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