हर-सू फैलती जड़ें धर्म के ठेकेदारों की, इसी से चलती रोज़ी, कुछ मक्कारों की !! मिलकर रहो सदा, सब आपस में लोगों, करो फेल राजनीति, ढोंगी, चाटुकारों की !! झूठ, नफ़रत, बस यही दिखाते हैं अब, बन्द हो ज़ुबाँ, क़लम, ऐसे पत्रकारों की !! घर में आजाये रौनक ग़रीब के भी जो, छीन ली जाये दौलत सियासतदारों की !! जहाँ देखो क़त्ल, लूट, दहशत है आज, कैसी हो गयी पहरेदारी पहरेदारों की !! जिनकी फ़ितरत में बस लड़ाने का हुनर, हनीफ़` बात करता है उन गुनहगारों की !!