सच्चाई...


यहां कितने सुरज रोने लगे है।

अंधेरे चारों ओर फैलने लगे है।


चिंगारियों कि तो निकल पडी है,

बाप बेटों को अब खोने लगे है।


दहलीज ए दरीया चली है आवाम,

हकीम ही खुद अब सोने लगे है।


खूनकी बुंदों से मैले है तख्त सभी,

साहेब गरीबों के पसीनेसे उसे धोने लगे है।


कोई मांगे रोटी कोई प्यास का मारा है,

तो शाह आल्ला और राम कहने लगे है।


कवीराज ( हणमंत यादव ).