इत्तेफाक...


वो जैसे आंधी तुफां कहर लगता है।

सुनसान उजडा हुआ शहर लगता है।

इतने करीब है वो मेरे दिल के,

के उसे छूने से भी डर लगता है।

हम उनकी हाथों से तेजाब भी पी जाते है,

उन्हें हमारा अमृत भी जहर लगता है।

बडी मोहब्बत है उस संगदिल को कांटों से,

हमारा हाथ भी उन्हें खंजर लगता है।

अजीब इत्तेफाक है उनकी आंखों में,

ये हरा भरा शहर भी उन्हें बंजर लगता है।...


हणमंत यादव (कवीराज)